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भारतीय संस्कृति और कालिदास का अभिनव बोध

डॉ. ज्योति वर्मा

प्रकाशक : आराधना ब्रदर्स प्रकाशित वर्ष : 2021
पृष्ठ :103
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 16189
आईएसबीएन :9789392497094

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भारतीय संस्कृति और कालिदास का अभिनव बोध

अनुक्रमणिका

प्राक्कथन

प्रथम अध्यायः-
वैदिक युग, वेद भाषा की उत्तरोत्तर बढ़ती हुई दुर्योधता, ब्राह्मण ग्रंथो के निर्माण का हेतु और उनकी भाषा सूत्र ग्रंथों का निर्माण भाषा विषयक दुरूहता के कारण वैदिक कर्मकांड और ज्ञान मार्ग का विवाद, सांस्कृतिक परिवर्तन के काल की परिस्थितिया: वेदविरोधी मतों का उदय, औपनिषदिक तत्व और धर्म में साम्य।

द्वितीय अध्याय-
उत्तर वैदिक युग वेद में अनास्था के कारण पूर्व देश के वासियों का वेद विरोधी आचार, मध्य तथा पूर्व में सांस्कृतिक भेद, वैदिक कर्मकांड विरोधी चार मुख्य संप्रदाय, शैव और वैष्णव धर्म का ब्राह्मण धर्म में समाहार, भागवत या वैष्णव धर्म शैव धर्म ।

तृतीय अध्याय-
पुराणेतिहास युग, नव जागरण के सूत्रधार : व्यास महाभारत पचम बंद. इस युग के राष्ट्रीय जीवन का नया रूप, इस युग की समन्वयी भावना वैदिक संस्कृति का नवीकरण, प्रवृत्तिमूलकता, तपस्वी, नारियां, अनेक शास्त्रों के समान अधिकार, गुण कर्म पर जाति, निवृत्ति भाव के प्रति जनक्रन्ति संस्कृत भाषा की पुनः प्रतिष्ठा के यत्न, रामायण का प्रवृत्तिपरक स्वर, पुराणों का योगदान।

चतुर्थ अध्याय-
लौकिक काया युग, निवृत्तिपरता का चरम विरोध, संस्कृत का नया रूप, लौकिक साहित्य का समन्वयी स्वर, देवों का स्वरूप, परिवर्तन देवों का मानवीय रूप, महाकाव्यों में शौर्य और अंगार का प्राधान्य अवतारी देवों का महत्व, यतियों की भी अभ्युदयप्रियता, जातिप्रथा की कट्टरता का विरोध, तपस्वी भी सपत्नीक, काव्य से सांस्कृतिक ऐक्य, हिन्दू धर्म और बौद्ध मत का विवाद, प्राचीन वैदिक धर्म का नवीन रूप, राष्ट्रीय ऐक्य का सूत्र काया।

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  1. अनुक्रमणिका

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